संस्था

  1. संस्था का नाम आदिवासी हो समाज महासभा
  2. संस्था का निबंधित कार्यालय – इस संस्था को निबंधित कार्यालय, क्लब भवन हारिगुटू, मडकमहातु, पो0-चाईबासा, थाना-मुफ्फसिल जिला-प0 सिहंभूम झारखण्ड ।
  3. कार्यक्षेत्र – महासभा को कार्यक्षेत्र और प्रभाव आदिवासी हो समाज के उन सभी सदस्यों पर होगा, जो सधारणतः भारत के किसी भी राज्यक्षेत्र में निवास करते हैं।
  4. आस्तियाँ एवं दायित्व- यह संस्था अविभाजित बिहार राज्य में आदिवासी हो समाज महासभा नाम से निबंधित संस्था जिसका निबंधन संख्या-153 वर्ष-1984-85 है, के अस्तियों एव दायित्वों को ग्रहण करती है।
  5. संस्था का उदेश्य – इस संस्था के निम्नलिखित उध्देश्य होंगे –
    • यह महासभा विरुध्द रुप से एक सामाजिक संगठन है, अतः इस महासभा का मूल उध्देश्य हो जाति को सामाजिक, आर्थिक, आध्यात्मिक, नैतिक और शैक्षणिक उत्थान और विकास करना तथा उनसे संबंधित समस्याओं और त्रुटियों को निवारण करना है।
    • सम्पूर्ण विश्व के आदिवासियों तथा अन्य लोगों से पारस्परिक संबंध स्थापित करके बंधुत्व, प्रेम, सेवा और सहयोग की भावना बढ़ाना है।
    • हो जाति के जन्म से मृत्यु तक के समस्त संस्कारों और दूस्तरों को बनाए ऱखना तथा यथासंभव उनमें एकरुपता लाने का सक्रिय प्रयास करना।
    • हो जाति के पर्व-त्योहार महासभा द्वारा निर्धारित किए गए समय पर मनाने का सक्रिय प्रयास करना।
    • हो(सरना) धर्म और उसकी पूजा उपासना की विधि की शुध्दता और एकरुपता बनाए रखना।
    • हो जाति के देशाउली-जाहेरा स्थान की रक्षा करना तथा उसकी पवित्रता बनाए रखना।
    • हो जाति के समाधिक्षेत्रों (दिरिससन) की रक्षा करना और सामाजिक दस्तूर के अनुसार उन्हें पवित्र तथा सुरक्षित क्षेत्र घोषित करना।
    • हो जाति के बीच अपनी धार्मिक, सामजिक, नैतिक परम्पराओं, रुढ़िजन्य विधियों (कस्टमरी लाँज) अपने विधिक अधिकारों का प्रचार-प्रसार करना तथा समाज को कुरीतियों से मुक्त करना।
    • पुस्तकालय, विधालय, पत्रकारिता, खेल-मैदान, कला-भवन और आवास-गृह आदि की स्थापना करना।
    • सरकार की ओर से प्राप्त सुविधाओं के प्रति हो जाति के सदस्यों को अवगत एवं जागरुक करना और उपर्युक्त सुविधाओं के संबंध में आवश्यक जानकारी प्राप्त करना, उन सुविधाओं के हकों की रक्षा करना और हर पहलू से हो जाति को हर तरह के सामाजिक, आर्थिक, नैतिक, धार्मिक एवं आध्यात्मिक शोषण से शांतिपूर्ण तथा संवैधानिक तरीके से रक्षा करना।
    • हो जाति की उन्नति के लिए हो भाषा साहित्य का निर्माण और प्रचार-प्रसार करना तथा उसे पढ़ाई में व्यवहृत करना।
    • कोष उगाहना और उसे हो समाज के विकास कार्यो में लगाना।
    • हो समाज के हित में युक्तिसगंत सैध्दान्तिक आधार पर विवेकपूर्ण विचारधारा अपनाना और उसे व्यवहार में लाना जिससे जाति की शुध्दता और आपसी मेल-मिलाप को प्रोत्साहान मिले, और
    • हो जाति के युवा तथा किशोर वर्ग में अपनी जाति धर्म पारम्परिक संस्कारों तथा राज्य के प्रति प्रेम आस्था तथा गौरव की भावना पोत्साहित करने और उनमें अनुशासन और चरित्र के उँचे आदर्श स्थापित करने के लिए महासभा की ओर से हर संभव सहायता और मार्गदर्शन प्रदान करना।